किसी को कब वो अपने दिल का कुछ अहवाल देता है
मैं उस से बात करता हूँ वो मुझ को टाल देता है
कोई तो है जो इस हैरत-सरा-ए-नूर-ओ-ज़ुल्मत में
सितारे को ज़िया आईने को तिमसाल देता है
बहुत इंकार करता है सवाल-ए-वस्ल पर लेकिन
ख़फ़ा हो जाऊँ तो गर्दन में बाँहें डाल देता है
कोई चेहरों का सौदागर छुपा है इस ख़राबे में
पुरानी सूरतें ले कर नई अश्काल देता है
मैं जिस लम्हे गुज़रते वक़्त को महसूस करता हूँ
वो इक लम्हा 'फ़रासत' रंज-ए-माह-ओ-साल देता है
ग़ज़ल
किसी को कब वो अपने दिल का कुछ अहवाल देता है
फ़रासत रिज़वी

