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किसी की जब से जफ़ाओं का सिलसिला न रहा | शाही शायरी
kisi ki jab se jafaon ka silsila na raha

ग़ज़ल

किसी की जब से जफ़ाओं का सिलसिला न रहा

कलीम सहसरामी

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किसी की जब से जफ़ाओं का सिलसिला न रहा
दिल-ए-हज़ीं में मोहब्बत का हौसला न रहा

दयार-ए-हुस्न में मिलती नहीं है जिंस-ए-वफ़ा
दिल-ए-ग़रीब का अब उन से वास्ता न रहा

हवा-ए-यास ने शम-ए-उमीद गुल कर दी
किसी से अब कोई शिकवा भी बरमला न रहा

मिरी नज़र का तक़ाज़ा भला वो क्या समझें
कि हुस्न-ओ-इश्क़ में पहला सा राब्ता न रहा

उजड़ गया है कुछ इस तरह अब दयार-ए-वफ़ा
कहीं भी मेरी तमन्ना का नक़्श-ए-पा न रहा

ख़ुदी न हो सकी मिन्नत-कश-ए-नशात-ए-वफ़ा
हमारा हाथ कभी माइल-ए-दुआ न रहा

'कलीम' कौन मुसीबत में किस का होता है
दयार-ए-दोस्त में कोई भी आश्ना न रहा