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किसी के हाथ पर तहरीर होना | शाही शायरी
kisi ke hath par tahrir hona

ग़ज़ल

किसी के हाथ पर तहरीर होना

शफ़ीक़ सलीमी

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किसी के हाथ पर तहरीर होना
मिरा भी साहब-ए-तक़दीर होना

फ़क़त इक ख़्वाब हो कर रह गया है
अधूरे ख़्वाब की ताबीर होना

निकलना रूह की गहराई से और
दुआ का हामिल-ए-तासीर होना

ये होना तो है लेकिन कब ये होगा
क़बा-ए-ज़र का लीर-ओ-लीर होना

हिसार-ए-ज़ब्त से बाहर था वो अश्क
जिसे था दर्द की तफ़्सीर होना

'शफ़ीक़' आख़िर है इस पारा-सिफ़त को
किसी के सामने तस्वीर होना