किस की महफ़िल से उठ के आया हूँ
अपने घर में हूँ और तन्हा हूँ
तू मिरी ज़िंदगी की शाम न बन
मैं तिरी सुब्ह का उजाला हूँ
चाँद में बस्तियाँ बसा लेना
मुझ को ढूँढो कि मैं भी दुनिया हूँ
जान-ए-इमरोज़ रौनक़-ए-फ़र्दा
कोई समझे मुझे तो क्या क्या हूँ
कैसे झुटलाएगी मुझे दुनिया
मैं कि हालात का तक़ाज़ा हूँ
मेरी ख़ुशबू से बस रहे हैं चमन
मैं हर इक शाख़-ए-गुल से पैदा हूँ
ये जहाँ मज़रा-ए-तमन्ना है
और मैं हासिल-ए-तमन्ना हूँ
ग़ज़ल
किस की महफ़िल से उठ के आया हूँ
जमील मलिक

