EN اردو
किन हवालों में आ के उलझा हूँ | शाही शायरी
kin hawalon mein aa ke uljha hun

ग़ज़ल

किन हवालों में आ के उलझा हूँ

सय्यद शकील दस्नवी

;

किन हवालों में आ के उलझा हूँ
तेरी आँखों में ख़ुद को पढ़ता हूँ

कौन मुझ में है बर-सर-ए-पैकार
रोज़ किस से जिहाद करता हूँ

राह मुड़ मुड़ के लौट आती है
घर से जब भी ज़रा निकलता हूँ

रिश्ता-ए-दिल किसी से टूटा है
रोज़ राहें नई बदलता हूँ

आँसुओं से हवा के आँचल पर
किस सितमगर का नाम लिखता हूँ