कीधर की ख़ुशी कहाँ की शादी
जब दिल से हवस ही सब उड़ा दी
ता हाथ लगे न खोज दिल का
अय्यार नीं ज़ुल्फ़ ही उठा दी
पल मारते ख़ाक में मिलाया
टुक हँस के जिधर नज़र मिला दी
यारब सिवा लिक़ा-ए-वजहक
ला-मक़सूदी व ला-मुरादी
देते हो किसे ये बद-दुआएँ
क्या प्यारे 'असर' नीं फिर दुआ दी
ग़ज़ल
कीधर की ख़ुशी कहाँ की शादी
मीर असर

