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ख़्वाब ठहरा सर-ए-मंज़िल न तह-ए-बाम कभी | शाही शायरी
KHwab Thahra sar-e-manzil na tah-e-baam kabhi

ग़ज़ल

ख़्वाब ठहरा सर-ए-मंज़िल न तह-ए-बाम कभी

हसन नईम

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ख़्वाब ठहरा सर-ए-मंज़िल न तह-ए-बाम कभी
इस मुसाफ़िर ने उठाया नहीं आराम कभी

शब-ब-ख़ैर उस ने कहा था कि सितारे लरज़े
हम न भूलेंगे जुदाई का वो हंगाम कभी

सर-कशी अपनी हुई कम न उमीदें टूटीं
मुझ से कुछ ख़ुश न गया मौसम-ए-आलाम कभी

हम से आवारों की सोहबत में है वो लुत्फ़ कि बस
दो-घड़ी मिल तो सही गर्दिश-ए-अय्याम कभी

ऐ सबा मैं भी था आशुफ़्ता-सरों में यकता
पूछना दिल्ली की गलियों से मिरा नाम कभी