ख़्वाब में आओ मिरे रंगीन ख़्वाबों की तरह
पढ़ सकूँ तुम को मैं रूमानी किताबों की तरह
दीजिए तश्बीह क्या उन को मह-ओ-ख़ुर्शीद से
एक चेहरा उन का है सौ आफ़्ताबों की तरह
चाहे गर इंसाँ तो बन सकती है ला-फ़ानी हयात
ज़िंदगी इंसान की गो है हबाबों की तरह
जैसे मफ़हूम-ओ-मआ'नी से हों आरी सारे ही
पढ़ता हूँ इक एक चेहरे को किताबों की तरह
तिश्नगी सब की बुझाएँ बहर-ए-बे-पायाँ बनें
बन के दुनिया में रहें हम क्यूँ सराबों की तरह
ग़ज़ल
ख़्वाब में आओ मिरे रंगीन ख़्वाबों की तरह
आसी रामनगरी

