EN اردو
ख़्वाब में आओ मिरे रंगीन ख़्वाबों की तरह | शाही शायरी
KHwab mein aao mere rangin KHwabon ki tarah

ग़ज़ल

ख़्वाब में आओ मिरे रंगीन ख़्वाबों की तरह

आसी रामनगरी

;

ख़्वाब में आओ मिरे रंगीन ख़्वाबों की तरह
पढ़ सकूँ तुम को मैं रूमानी किताबों की तरह

दीजिए तश्बीह क्या उन को मह-ओ-ख़ुर्शीद से
एक चेहरा उन का है सौ आफ़्ताबों की तरह

चाहे गर इंसाँ तो बन सकती है ला-फ़ानी हयात
ज़िंदगी इंसान की गो है हबाबों की तरह

जैसे मफ़हूम-ओ-मआ'नी से हों आरी सारे ही
पढ़ता हूँ इक एक चेहरे को किताबों की तरह

तिश्नगी सब की बुझाएँ बहर-ए-बे-पायाँ बनें
बन के दुनिया में रहें हम क्यूँ सराबों की तरह