ख़्वाब बुनता रहूँ मैं बिस्तर पर
और तकिया करूँ मुक़द्दर पर
महव-ए-परवाज़ है ये दिल और मैं
जाँ छिड़कता हूँ इस कबूतर पर
उम्र-भर देखते रहे साए
धूप पड़ती रही मिरे सर पर
ख़ुद से मुश्किल हुआ सुख़न करना
वक़्त वो आ पड़ा सुख़न-वर पर
नींद उड़ने लगी है आँखों से
धूल जमने लगी है बिस्तर पर
ख़ाक होने से पेश-तर 'ग़ाएर'
नक़्श हो जाऊँ क्यूँ न पत्थर पर
ग़ज़ल
ख़्वाब बुनता रहूँ मैं बिस्तर पर
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर

