ख़ुर्शीद-रू की सोहबत जो अब नहीं तो फिर कब
शबनम की तरह क़ुर्बत जो अब नहीं तो फिर कब
ज़र्रे की तरह मुझ पर इक महर की नज़र कर
देखे वो मेहर-ए-तलअत जो अब नहीं तो फिर कब
जोड़ा है ज़ाफ़रानी उस गुल-बदन के बर में
ख़ुश हो मिरी तबीअत जो अब नहीं तो फिर कब
आलूदा-दामनी को धोने को मुंतज़िर हूँ
बारिश दे अब्र-ए-रहमत जो अब नहीं तो फिर कब
इस बाग़ में दो-रोज़ा है इश्क़-ए-ज़िंदगानी
गुल की तरह बशाशत जो अब नहीं तो फिर कब
ग़ज़ल
ख़ुर्शीद-रू की सोहबत जो अब नहीं तो फिर कब
इश्क़ औरंगाबादी

