ख़ुर्शीद-रू के महर की जिस पर निगाह हो
ताले उसी का ख़ल्क़ में रख़्शंदा-माह हो
दुश्मन हैं दीन ओ दिल के बुताँ देख बे-ख़बर
इस तरह कीजो रब्त कि जिस में निबाह हो
हरगिज़ न ऐब-ए-हुस्न कहे किस के मुँह पे साफ़
कर आईना मिरा दिल-ए-रौशन निगाह हो
रहता है दिल तो उस के ज़नख़दाँ के चाह बीच
नीं है बईद उस को भी गर दिल की चाह हो
आसाँ सिरात-ए-हश्र से हो एक पल में पार
गर साथ 'इश्क़'-ए-आसी के फ़ज़्ल-ए-इलाह हो
ग़ज़ल
ख़ुर्शीद-रू के महर की जिस पर निगाह हो
इश्क़ औरंगाबादी

