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ख़ुदी का राज़दाँ हो कर ख़ुदी की दास्ताँ हो जा | शाही शायरी
KHudi ka raazdan ho kar KHudi ki dastan ho ja

ग़ज़ल

ख़ुदी का राज़दाँ हो कर ख़ुदी की दास्ताँ हो जा

अर्श मलसियानी

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ख़ुदी का राज़दाँ हो कर ख़ुदी की दास्ताँ हो जा
जहाँ से क्या ग़रज़ तुझ को तू आप अपना जहाँ हो जा

बयान-ए-पाएमाली शिकवा-ए-बर्क़-ए-तपाँ हो जा
गुलिस्तान-ए-जहाँ के पत्ते पत्ते की ज़बाँ हो जा

शरीक-ए-कारवाँ होने की गो ताक़त नहीं तुझ में
मगर इतनी तो हिम्मत कर कि गर्द-ए-कारवाँ हो जा

तज़लज़ुल से बरी हो तेरा इस्तिक़्लाल उल्फ़त में
यक़ीन पर यक़ीं हो जा गुमान‌‌‌-ए-बे-गुमाँ हो जा

किसी सूरत तो शरह-ए-आरज़ू-ए-शौक़ करनी है
ज़बाँ चुप है अगर ऐ दिल तो आप अपनी ज़बाँ हो जा

ज़माने पर भरोसा कर न राज़-ए-इश्क़ का ऐ दिल
जहाँ तक हो सके तू आप अपना राज़-दाँ हो जा

तुझे दाग़ों के लाखों माह-ओ-अंजुम मिल ही जाएँगे
उठ ऐ दर्द-ए-दिल पर आह उठ कर आसमाँ हो जा

कभी तो आरज़ी सा इक तबस्सुम लब पे आने दे
कभी तो मेहरबाँ मुझ पर मिरे ना-मेहरबाँ हो जा

तिरे आने पे ऐ तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ मैं ख़ुश हूँ
दिल-ए-बेताब में आ कर हिसाब-ए-दोस्ताँ हो जा

बुलंदी नाम से ऐ 'अर्श' मिल सकती नहीं तुझ को
ज़मीन-ए-शेर पर औज-ए-सुख़न से आसमाँ हो जा