ख़ुद अपने ज़ख़्म सीना आ गया है
बिल-आख़िर मुझ को जीना आ गया है
मुनाफ़िक़ हो गए हैं होंट मेरे
मिरे दिल को भी कीना आ गया है
बहा कर ले गया तूफ़ाँ जवानी
लब-ए-साहिल सफ़ीना आ गया है
किसी दुख पर भी आँखें नम न पा कर
मसाइब को पसीना आ गया है
बड़ी उस्ताद है ये ज़िंदगी भी
लो मुझ को ज़हर पीना आ गया है
लगा कर ज़ख़्म ख़ुद मरहम भी देगा
उसे इतना क़रीना आ गया है
हरे होने चले हैं ज़ख़्म सारे
कि सावन का महीना आ गया है
ग़ज़ल
ख़ुद अपने ज़ख़्म सीना आ गया है
फ़रहत शहज़ाद

