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ख़िरद फ़रेब-ए-नज़ारों की कोई बात करो | शाही शायरी
KHirad fareb-e-nazaron ki koi baat karo

ग़ज़ल

ख़िरद फ़रेब-ए-नज़ारों की कोई बात करो

शकेब जलाली

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ख़िरद फ़रेब-ए-नज़ारों की कोई बात करो
जुनूँ-नवाज़ बहारों की कोई बात करो

किसी की वा'दा-ख़िलाफ़ी का ज़िक्र ख़ूब नहीं
मिरे रफ़ीक़ सितारों की कोई बात करो

ज़माना-साज़ ज़माने की बात रहने दो
ख़ुलूस-ए-दोस्त के मारों की कोई बात करो

घटा की ओट से छुप कर जो देखते थे हमें
उन्हीं शरीर सितारों की कोई बात करो

ज़माना ज़िक्र-ए-हवादिस से काँप उठता है
सुकूँ-ब-दोश किनारों की कोई बात करो

नहीं है हद्द-ए-नज़र तक वजूद साहिल का
फ़ज़ा मुहीब है धारों की कोई बात करो

सलाम-ए-शौक़ लिए थे किसी ने जिन से 'शकेब'
उन्हीं लतीफ़ इशारों की कोई बात करो