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ख़ेमा-ए-जाँ को जो देखूँ तो शरर-बार लगे | शाही शायरी
KHema-e-jaan ko jo dekhun to sharar-bar lage

ग़ज़ल

ख़ेमा-ए-जाँ को जो देखूँ तो शरर-बार लगे

आमिर नज़र

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ख़ेमा-ए-जाँ को जो देखूँ तो शरर-बार लगे
तार-ए-शबनम भी यहाँ शो'लों का बाज़ार लगे

एक हसरत पस-ए-दहलीज़-ए-अना बैठी रही
कोई तो आ के रुका हो दर-ओ-दीवार लगे

चश्म-ए-पुर-आब में बहती थी सियाही शब की
धूप का रक़्स मुझे और गिराँ-बार लगे

क्या हुआ मंज़र-ए-मौजूद की पेशानी को
ज़र्द पत्तों की तरह साया-ए-अश्जार लगे

मेरी वहशत का लहू चाट चुकी है दुनिया
अब तमाशा-ए-ख़िरद सूरत-ए-आज़ार लगे

मेरा चेहरा है किसी क़ब्र का कतबा 'आमिर'
दिल की आवाज़ भी अब शोर-ए-अज़ादार लगे