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ख़त्म होगा अब सफ़र पेश-ए-नज़र है रू-ए-दोस्त | शाही शायरी
KHatm hoga ab safar pesh-e-nazar hai ru-e-dost

ग़ज़ल

ख़त्म होगा अब सफ़र पेश-ए-नज़र है रू-ए-दोस्त

मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

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ख़त्म होगा अब सफ़र पेश-ए-नज़र है रू-ए-दोस्त
आ रही है आज की मंज़िल से मुझ को बू-ए-दोस्त

आगे आगे हसरतें और पीछे पीछे मैं चला
इस तरह घर से निकल कर जा रहा हूँ सू-ए-दोस्त

पहले तो दिल ने जिगर की जान ना-क़दरी से ली
ढूँढता फिरता है आलम भर में अब पहलू-ए-दोस्त

वाह-री क़िस्मत कि गर्दूं पर सहर होने लगी
गो पड़े थे मेरे बाज़ू पर अभी गेसू-ए-दोस्त

ख़ुद-बख़ुद मेरी रग-ए-गर्दन फड़क उठती है आज
कर रहा है कोई ज़िक्र-ए-क़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-दोस्त

लफ़्ज़ जो दिल की तलब में था वो बिल्कुल सेहर था
बातों ही बातों में मुझ पर चल गया जादू-ए-दोस्त

कोई दीवाना चला है हश्र में इस वज़्अ' से
चाक ता-दामन गरेबाँ मुँह पे ख़ाक-ए-कू-ए-दोस्त

दिल से मुझ को साफ़ साफ़ आख़िर ये कह देना पड़ा
अब वही सख़्ती भी झेले जो बिगाड़े ख़ू-ए-दोस्त

हो अगर ज़िंदा तुम ऐ 'आलिम' तो अब होश्यार हो
कब तलक सोया करोगे थक गया ज़ानू-ए-दोस्त