कौन सा वो ज़ख़्म-ए-दिल था जो तर-ओ-ताज़ा न था
ज़िंदगी में इतने ग़म थे जिन का अंदाज़ा न था
हम निकल सकते भी तो क्यूँ कर हिसार-ए-ज़ात से
सिर्फ़ दीवारें ही दीवारें थीं दरवाज़ा न था
उस की आँखों से नुमायाँ थी मोहब्बत की चमक
उस के चेहरे पर नई तहज़ीब का ग़ाज़ा न था
इतनी शिद्दत से कभी आया न था उस का ख़याल
ज़ख़्म-ए-दिल पहले कभी इतना तर-ओ-ताज़ा न था
उस की हर इक सोच में है इक मुसलसल इंतिशार
इस तरह बिखरा हुआ इस दिल का शीराज़ा न था
दूर कर देगा ज़माने से मुझे मेरा ख़ुलूस
मुझ को अपनी इस सलाहियत का अंदाज़ा न था
'अर्श' उन की झील सी आँखों का उस में क्या क़ुसूर
डूबने वालों को गहराई का अंदाज़ा न था
ग़ज़ल
कौन सा वो ज़ख़्म-ए-दिल था जो तर-ओ-ताज़ा न था
अर्श सहबाई

