कौन कहता है कि मरना मिरा अच्छा न हुआ
फ़िक्र दरमाँ न हुई रंज मुदावा न हुआ
वाह इस नाले पे और इतनी अदू को नाज़िश
बज़्म में और तो क्या हश्र भी बरपा न हुआ
सैर-ए-गुलशन से रहे शाद व-लेकिन अफ़्सोस
अब के मा'लूम कुछ अहवाल क़फ़स का न हुआ
सो गए सुनते ही सुनते वो दिल-ए-ज़ार का हाल
जब को हम समझे थे अफ़्सूँ वही अफ़्साना हुआ
रब्त कुछ दाग़-ओ-जिगर का तो है चस्पाँ 'आशिक़'
वर्ना इस दौर में कोई भी किसी का न हुआ
ग़ज़ल
कौन कहता है कि मरना मिरा अच्छा न हुआ
आशिक़ अकबराबादी

