कश्ती है तबाह दिल-शुदों की
लेना ख़बर अपने बे-ख़ुदों की
ऐ सर्व-सही के एक गुलशन
चलियो मत चाल ख़ुश-क़दों की
क्यूँ-कर वो करे सुलूक हम से
ख़ातिर है अज़ीज़ हासिदों की
तामीर कुनिश्त-ए-दिल हुआ जब
ज़ाहिद न बिना थी मस्जिदों की
कहना मत मान वाइज़ों का
बेहूदा है बात बेहुदों की
दाढ़ी न रहेगी शैख़-साहिब
सोहबत में न बैठो अमरदों की
ग़ज़ल
कश्ती है तबाह दिल-शुदों की
जोशिश अज़ीमाबादी

