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कनार-ए-दश्त अकेले ठहरने पर होगा | शाही शायरी
kanar-e-dasht akele Thaharne par hoga

ग़ज़ल

कनार-ए-दश्त अकेले ठहरने पर होगा

जावेद शाहीन

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कनार-ए-दश्त अकेले ठहरने पर होगा
दिलों में ख़ौफ़ का अंदाज़ा डरने पर होगा

समझता है मिरी आदत वो हुस्न-ए-बे-परवा
समेट लूँगा उसे जब बिखरने पर होगा

पयाम दे न सकी गुल का बू-ए-सुस्त-ख़िराम
न जाने अब कहाँ मौसम गुज़रने पर होगा

कहीं पे काई कहीं हब्स और कहीं दलदल
ये हाल शहर का पानी उतरने पर होगा

मैं सोचता हूँ दरख़्तों की छाँव में 'शाहीं'
कि तय तमाम सफ़र सिर्फ़ करने पर होगा