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कल मय-कदे की जानिब आहंग-ए-मोहतसिब है | शाही शायरी
kal mai-kade ki jaanib aahang-e-mohtasib hai

ग़ज़ल

कल मय-कदे की जानिब आहंग-ए-मोहतसिब है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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कल मय-कदे की जानिब आहंग-ए-मोहतसिब है
दरपेश मय-कशों को फिर जंग-ए-मोहतसिब है

होता है शीशा-ए-दिल चूर उस की गुफ़्तुगू से
यारब ये पंद-ए-नासेह या संग-ए-मोहतसिब है

मुँह सुर्ख़ हो रहा है बीम-ए-मुग़ाँ से उस का
जो कुछ है रंग-ए-मीना सो रंग-ए-मोहतसिब है

अज़-बस गिराँ है उस पर मीना से मय की क़ुलक़ुल
पढ़ना भी चार क़ुल का अब नंग-ए-मोहतसिब है

हरगिज़ 'बक़ा' न रहियो दौर-ए-फ़लक से ग़ाफ़िल
मस्तों की नित कमीं में सर-चंग-ए-मोहतसिब है