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कैसी बला-ए-जाँ है ये मुझ को बदन किए हुए | शाही शायरी
kaisi bala-e-jaan hai ye mujhko badan kiye hue

ग़ज़ल

कैसी बला-ए-जाँ है ये मुझ को बदन किए हुए

फ़रहत एहसास

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कैसी बला-ए-जाँ है ये मुझ को बदन किए हुए
मिट्टी के इस बिदेस को अपना वतन किए हुए

मेरे लब-ए-वजूद पर सूखे पड़े हुए हैं लफ़्ज़
मौजों ज़माना हो गया उस से सुख़न किए हुए

आया था इक गुल-ए-विसाल दामन-ए-हिज्र में कभी
मैं हूँ उस एक फूल को अपना चमन किए हुए

उस की तरफ़ से आज तक शोर न ख़ामुशी कोई
कब से हूँ उस ख़ला की सम्त रू-ए-सुख़न किए हुए