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कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द | शाही शायरी
kahin sukun na mila dil ko bazm-e-yar ke baad

ग़ज़ल

कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द

फ़ना बुलंदशहरी

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कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द
कि बे-क़रार रही ज़िंदगी क़रार के बा'द

उठे न पाँव मोहब्बत की रहगुज़ार के बा'द
कोई क़याम नहीं है तिरे दयार के बा'द

क़बाएँ चाक तो करते रहेंगे दीवाने
कभी बहार से पहले कभी बहार के बा'द

शराब-ए-इश्क़ का मय-कश रहा सदा मदहोश
तेरी निगाह की मस्ती चढ़ी ख़ुमार के बा'द

निगाह-ए-शौक़ ने दोनों जहाँ को छान लिया
मिला न रंग कोई जल्वा-गह-ए-यार के बा'द

तलब है उस की तो हो जाओ क़त्ल-ए-इश्क़ 'फ़ना'
मिली हैं अज़्मतें मंसूर को भी दार के बा'द