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कहाँ है वो गुल-ए-ख़ंदाँ हमें नहीं मालूम | शाही शायरी
kahan hai wo gul-e-KHandan hamein nahin malum

ग़ज़ल

कहाँ है वो गुल-ए-ख़ंदाँ हमें नहीं मालूम

पंडित जवाहर नाथ साक़ी

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कहाँ है वो गुल-ए-ख़ंदाँ हमें नहीं मालूम
न पूछ बुलबुल-ए-नालाँ हमें नहीं मालूम

फ़िराक़ ही में बसर हो गई हमारी उम्र
है कौन वस्ल से शादाँ हमें नहीं मालूम

हमें तो एक सदा-ए-जरस ही आती है
हुआ है कौन हुदा-ख़्वाँ हमें नहीं मालूम

तलाश-ए-ख़िज़्र तरीक़त है इस लिए सालिक
कहाँ है चश्मा-ए-हैवाँ हमें नहीं मालूम

तलाश-ए-यार में 'साक़ी' हुए हैं सर-गरदाँ
कहाँ है मंज़िल-ए-जानाँ हमें नहीं मालूम