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कभी पैग़ाम-ए-सुकूँ तेरी नज़र ने न दिया | शाही शायरी
kabhi paigham-e-sukun teri nazar ne na diya

ग़ज़ल

कभी पैग़ाम-ए-सुकूँ तेरी नज़र ने न दिया

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

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कभी पैग़ाम-ए-सुकूँ तेरी नज़र ने न दिया
ज़िंदगी छीन ली इस तरह कि मरने न दिया

थी बहार-ए-गुल-ए-जल्वा कि हवा का झोंका
जिस ने दामन निगह-ए-शौक़ का भरने न दिया

दी जिस एहसास ने मरने की तमन्ना हम को
उसी एहसास की रानाई ने मरने न दिया

जाने क्या क़िस्सा-ए-ग़म था कि नज़र ने तेरी
भूलने भी न दिया याद भी करने न दिया

उम्र भर एक तमन्ना-ए-सुकूँ ने हम को
दिल की बेताबी का अंदाज़ा भी करने न दिया