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कब तसव्वुर में तिरे दीदा-ए-तर बंद किया | शाही शायरी
kab tasawwur mein tere dida-e-tar band kiya

ग़ज़ल

कब तसव्वुर में तिरे दीदा-ए-तर बंद किया

मारूफ़ देहलवी

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कब तसव्वुर में तिरे दीदा-ए-तर बंद किया
ख़ाना-ए-आइना में तुझ को नज़र-बंद किया

क्या नज़ाकत है सबा उस की कमर की जिस ने
सुब्ह-दम तार-ए-रग-ए-गुल से क़मर-बंद किया

दिल का अहवाल जो खुलता नहीं तू ने ऐ चश्म
क़ासिद-ए-अश्क को आने से मगर बंद किया

राहत-ए-ख़्वाब-ए-अदम देख के सब ने यक-दस्त
नक़्श-ए-पा से कफ़-ए-हर-ख़ाक में दर-बंद किया

देख 'मारूफ़' कि उस शोख़ ने शब को यक-दस्त
ताइर-ए-रंग-ए-हिना को ब-हुनर बंद किया