कब तक फिरना ग़ारों और गुफाओं में
आओ वापस लौट चलें अब गाँव में
सहरा में इक रेत-महल तामीर करें
सुख से बैठें अंगूरों की छाँव में
रूह भटकती है बाग़ी शहज़ादी की
सुनते हैं इन ख़ाली महल-सराओं में
मुझ में छटी हिस जागी ताज़ा मिट्टी की
तुग़्यानी है फिर पाँचों दरियाओं में
गय्या तो सरदार के बाग़ में क़त्ल हुई
चरवाहा सोता है नीम की छाँव में
एक ने बेटी एक ने बेटा जन्म दिया
कितना फ़र्क़ है हम दोनों की माओं में
ग़ज़ल
कब तक फिरना ग़ारों और गुफाओं में
इशरत आफ़रीं

