कब से माँग रहे हैं तुम से
साग़र से मीना से ख़ुम से
हम भी कुछ कुछ खोए हुए हैं
आप भी लगते हैं गुम-सुम से
जागेंगे बे-जान से जज़्बे
तेरे दहन के हर्फ़-ए-क़ुम से
दोश-ए-फ़रस से देखें नीचे
एक बँधा है दिल भी सुम से
सुन लो फ़साना आँख का मेरी
दरिया से नदी से क़ुल्ज़ुम से
ग़ज़ल
कब से माँग रहे हैं तुम से
अफ़ीफ़ सिराज

