कब गुल है हवा-ख़्वाह सबा अपने चमन का
वा जुम्बिश-ए-दम से है रफ़ू ज़ख़्म-ए-कुहन का
बेताबी-ए-दिल तेरे शहीदों की कहाँ जाए
कुछ कम रग-ए-बिस्मिल से नहीं तार कफ़न का
देता है फिर आईने को किस वास्ते बोसा
वो आप जो दिल-दादा नहीं अपने दहन का
मानिंद-ए-हबाब आप किया इश्क़ ने 'ममनूँ'
पाया न निशाँ जामा में अपने कहीं तन का

ग़ज़ल
कब गुल है हवा-ख़्वाह सबा अपने चमन का
ममनून निज़ामुद्दीन