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काश सुनते वो पुर-असर बातें | शाही शायरी
kash sunte wo pur-asar baaten

ग़ज़ल

काश सुनते वो पुर-असर बातें

अज़ीज़ लखनवी

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काश सुनते वो पुर-असर बातें
दिल से जो की थीं उम्र-भर बातें

बे-सबब तेरे लब नहीं ख़ामोश
कर रही है तिरी नज़र बातें

कोई समझाए आ के नासेह को
सुन सके कौन इस क़दर बातें

उस के अफ़्साने बन गए लाखों
मैं ने जो की थीं उम्र-भर बातें

दम उलट जाएगा 'अज़ीज़' 'अज़ीज़'
रह न ख़ामोश कुछ तो कर बातें