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काम में अपने ज़ुहूर-ए-हक़ है आप | शाही शायरी
kaam mein apne zuhur-e-haq hai aap

ग़ज़ल

काम में अपने ज़ुहूर-ए-हक़ है आप

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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काम में अपने ज़ुहूर-ए-हक़ है आप
हज़रत-ए-आदम के तो माँ थी न बाप

उन को दे कुछ, मत ज़राफ़त उन से कर
ले न ऐ नादाँ अतीतों के शराप

हम तही-दस्ती में भी कुछ कम नहीं
हाथ में राजा के हो सोने की छाप

आह-ओ-नाले का समझ टुक ज़ेर-ओ-बम
सख़्त मुश्किल इन सुरों की है अलाप

हर कोई चाहेगा अपनी मग़फ़िरत
हश्र में सब को पड़ेगी आपा-धाप

'मुसहफ़ी' मत उस के कूचे से निकल
जब तलक दम है ज़मीं तू वाँ की नाप