काम आसाँ है मगर देखिए दुश्वार भी है
आगे दरवाज़े के रक्खी हुई दीवार भी है
देने वाले से मुझे कोई शिकायत क्यूँ है
राह में धूप भी है साया-ए-अश्जार भी है
क़त्ल कर के जो मुझे साए में फेंक आया है
लोग कहते हैं वही मेरा तरफ़-दार भी है
तुझ को बस अपनी ही तस्वीर नज़र आती है
आइने में कहीं हैरत कहीं ज़ंगार भी है
क्यूँ भला वक़्त का नुक़सान करोगे प्यारे
जो यहाँ अब है तमाशा वही उस पार भी है
मेरे आबा से मुझे क्या न मिला है 'हमदम'
ताक़ में देखिए मुसहफ़ भी है तलवार भी है
ग़ज़ल
काम आसाँ है मगर देखिए दुश्वार भी है
हमदम कशमीरी

