काकरोचों मकड़ियों की फ़स्ल आ कर तू भी देख
उम्र-भर देखा जो मैं ने वो घड़ी-भर तू भी देख
इक मुसलसल बे-वक़ूफ़ी का अमल है ज़िंदगी
मेरे हिस्से में जो आया वो मुक़द्दर तू भी देख
दूसरे के तजरबे पर टेढ़ी बुनियादें न रख
बल्ब को अपनी हथेली से पिचक कर तू भी देख
ख़्वाहिशें कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने लगीं
ख़ुद-कुशी की वारदातों का ये मंज़र तू भी देख
देख अंदर की रगड़ कितनी अज़िय्यत-नाक है
तंग का बोसी ख़लाओं में उतर कर तू भी देख
ग़ज़ल
काकरोचों मकड़ियों की फ़स्ल आ कर तू भी देख
अतीक़ुल्लाह

