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जुनूँ की फ़स्ल आई बढ़ गई तौक़ीर पत्थर की | शाही शायरी
junun ki fasl aai baDh gai tauqir patthar ki

ग़ज़ल

जुनूँ की फ़स्ल आई बढ़ गई तौक़ीर पत्थर की

रशीद लखनवी

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जुनूँ की फ़स्ल आई बढ़ गई तौक़ीर पत्थर की
सर-ए-शोरीदा ख़ुद करने लगा तदबीर पत्थर की

ये मुश्किल किस तरह हल हो नहीं शमशीर पत्थर की
दिल-ए-सय्याद पत्थर गर्दन-ए-नख़चीर पत्थर की

बिना आईना चमकी किस क़दर तक़दीर पत्थर की
तुम्हारे रू-ब-रू आया ज़हे तौक़ीर पत्थर की

हमारे जोश-ए-वहशत ने ये हम को रंग दिखलाया
न कुछ तक़्सीर लड़कों की न कुछ तक़्सीर पत्थर की

निशाँ कुछ आप भी कर दें हुआ दफ़्न आप का मजनूँ
पए तारीख़ रेहलत कीजिए तदबीर पत्थर की

रगों में मेरी पेशानी की जोश-ए-ख़ूँ हुआ पैदा
हिकायत लिख चुका जब कातिब-ए-तक़दीर पत्थर की

जो तू समझे तो मेरे तेरे दिल की एक सूरत है
ये है तस्वीर मिट्टी की वो है तस्वीर पत्थर की

न जिस में लफ़्ज़-ओ-मा'नी हों कलाम उस को नहीं कहते
चटकना पत्थरों का कब हुई तक़रीर पत्थर की

तिरा सौदा जहाँ पर था रसाई हो गई वाँ तक
पड़ा सर पर हमारे लड़ गई तक़दीर पत्थर की

लगाया संग अपने हाथ से तू ने मिरे सर पर
ख़ुशा तक़दीर मेरी और ज़हे तक़दीर पत्थर की

क़सम लोगो अदब से आँख उठा के मैं ने देखा हो
तुम्हारे दर में लोहे की है या ज़ंजीर पत्थर की

दिल-ए-सख़्त ऐ 'रशीद'-ए-ज़ार अपना है गराँ हम को
बजा है किस तरह भारी न हो तस्वीर पत्थर की