जो तू गया था तो तेरा ख़याल रह जाता
हमारा कोई तो पुर्सान-ए-हाल रह जाता
बुरा था या वो भला लम्हा-ए-मोहब्बत था
वहीं पे सिलसिला-ए-माह-ओ-साल रह जाता
बिछड़ते वक़्त ढलकता न गर इन आँखों से
इस एक अश्क का क्या क्या मलाल रह जाता
तमाम आईना-ख़ाने की लाज रह जाती
कोई भी अक्स अगर बे-मिसाल रह जाता
गर इम्तिहान-ए-जुनूँ में न करते क़ैस की नक़्ल
'जमाल' सब से ज़रूरी सवाल रह जाता
ग़ज़ल
जो तू गया था तो तेरा ख़याल रह जाता
जमाल एहसानी

