EN اردو
जो सज़ा चाहो मोहब्बत से दो यारो मुझ को | शाही शायरी
jo saza chaho mohabbat se do yaro mujhko

ग़ज़ल

जो सज़ा चाहो मोहब्बत से दो यारो मुझ को

असग़र मेहदी होश

;

जो सज़ा चाहो मोहब्बत से दो यारो मुझ को
लेकिन अख़्लाक़ के पत्थर से न मारो मुझ को

आबशारों की तरह मैं नहीं गिरने वाला
धूप की तरह पहाड़ों से उतारो मुझ को

मैं तो हर हाल में डूबूँगा मगर अख़्लाक़न
ये ज़रूरी है कि साहिल से पुकारो मुझ को

अज़्मत-ए-तिश्ना-लबी भूल न जाओ लोगो
फिर किसी दश्त से इक बार गुज़ारो मुझ को

तुम तो डूबे हुए ख़ुर्शीद के पर्वर्दा हो
तुम नहीं जानते ऐ चाँद सितारो मुझ को