जो समझाते भी आ कर वाइज़-ए-बरहम तो क्या करते
हम इस दुनिया के आगे उस जहाँ का ग़म तो क्या करते
हरम से मय-कदे तक मंज़िल-ए-यक-उम्र थी साक़ी
सहारा गर न देती लग़्ज़िश-ए-पैहम तो क्या करते
जो मिट्टी को मिज़ाज-ए-गुल अता कर दें वो ऐ वाइज़
ज़मीं से दूर फ़िक्र-ए-जन्नत-ए-आदम तो क्या करते
सवाल उन का जवाब उन का सुकूत उन का ख़िताब उन का
हम उन की अंजुमन में सर न करते ख़म तो क्या करते
जहाँ 'मजरूह' दिल के हौसले टूटें निगाहों से
वहाँ करते भी मर्ग-ए-शौक़ का मातम तो क्या करते
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ग़ज़ल
जो समझाते भी आ कर वाइज़-ए-बरहम तो क्या करते
मजरूह सुल्तानपुरी