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जो राह-ए-मुलाक़ात थी सो जान गए हम | शाही शायरी
jo rah-e-mulaqat thi so jaan gae hum

ग़ज़ल

जो राह-ए-मुलाक़ात थी सो जान गए हम

जुरअत क़लंदर बख़्श

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जो राह-ए-मुलाक़ात थी सो जान गए हम
ऐ ख़िज़्र-ए-तसव्वुर तिरे क़ुर्बान गए हम

जमइय्यत-ए-हुस्न आप की सब पर हुई ज़ाहिर
जिस बज़्म में बा-हाल-ए-परेशान गए हम

उस घर के तसव्वुर में जूँ ही बंद कीं आँखें
सद-शुक्र कि बे-मिन्नत-ए-दरबान गए हम

कल वाक़िफ़-ए-कार अपने से कहता था वो ये बात
'जुरअत' के जो घर रात को मेहमान गए हम

क्या जानिए कम-बख़्त ने किया हम पे क्या सेहर
जो बात न थी मानने की मान गए हम