जो राह-ए-मुलाक़ात थी सो जान गए हम
ऐ ख़िज़्र-ए-तसव्वुर तिरे क़ुर्बान गए हम
जमइय्यत-ए-हुस्न आप की सब पर हुई ज़ाहिर
जिस बज़्म में बा-हाल-ए-परेशान गए हम
उस घर के तसव्वुर में जूँ ही बंद कीं आँखें
सद-शुक्र कि बे-मिन्नत-ए-दरबान गए हम
कल वाक़िफ़-ए-कार अपने से कहता था वो ये बात
'जुरअत' के जो घर रात को मेहमान गए हम
क्या जानिए कम-बख़्त ने किया हम पे क्या सेहर
जो बात न थी मानने की मान गए हम
ग़ज़ल
जो राह-ए-मुलाक़ात थी सो जान गए हम
जुरअत क़लंदर बख़्श

