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जो परी भी रू-ब-रू हो तो परी को मैं न देखूँ | शाही शायरी
jo pari bhi ru-ba-ru ho to pari ko main na dekhun

ग़ज़ल

जो परी भी रू-ब-रू हो तो परी को मैं न देखूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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जो परी भी रू-ब-रू हो तो परी को मैं न देखूँ
मिरी आँखें बंद कर दो कि किसी को मैं न देखूँ

दिल-ए-गर्म ख़ून-ए-उल्फ़त मिरे बर में रख दिया है
सू-ए-गुल तो मुल्तफ़ित हूँ जो कली को मैं न देखूँ

मिरा दिल लगा है जिस से मिरा जी गया है जिस पर
मिरी क्यूँ-कि ज़िंदगी हो जो उसी को मैं न देखूँ

मिरी तुझ से ज़िंदगी है तो मिरा जिगर है जी है
किसे देख कर जियूँ फिर जो तुझी को मैं न देखूँ

मिरी क्यूँ-कि हो तसल्ली तू ही 'मुसहफ़ी' बता फिर
दिल-ए-शब भी उस सनम की जो गली को मैं न देखूँ