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जो मुर्ग़-ए-क़िबला-नुमा बन के आशियाँ से चले | शाही शायरी
jo murgh-e-qibla-numa ban ke aashiyan se chale

ग़ज़ल

जो मुर्ग़-ए-क़िबला-नुमा बन के आशियाँ से चले

शाद लखनवी

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जो मुर्ग़-ए-क़िबला-नुमा बन के आशियाँ से चले
तड़प तड़प के वहीं रह गए जहाँ से चले

जिगर शिगाफ़ हो या दिल हो चाक वहशत से
जुनूँ में जामा-ए-तन देखिए कहाँ से चले

जो मर के रेग-ए-रवाँ भी बने ज़ईफ़ी में
यहाँ पे रह गए हम ना-तवाँ वहाँ से चले

सबात-ए-जामा-ए-हस्ती हो ख़ाक पीरी में
जो पैरहन हो पुराना बहुत कहाँ से चले

वहाँ से आए अकेले थे नामुरादाना
हज़ार हसरत-ओ-अरमाँ लिए यहाँ से चले

मिरा तिरा की तरह 'शाद' ये भी ईता है
ये क़ाफ़िया न नहीं से चले न हाँ से चले