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जो इंसाँ बारयाब-ए-पर्दा-ए-असरार हो जाए | शाही शायरी
jo insan baryab-e-parda-e-asrar ho jae

ग़ज़ल

जो इंसाँ बारयाब-ए-पर्दा-ए-असरार हो जाए

सीमाब अकबराबादी

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जो इंसाँ बारयाब-ए-पर्दा-ए-असरार हो जाए
तो इस बातिल--कदे में ज़िंदगी दुश्वार हो जाए

ये दुनिया-ए-वफ़ा दुनिया-ए-बे-आज़ार हो जाए
मुझी पर क्यूँ न तकमील-ए-जफ़ा-ए-यार हो जाए

जो ज़ुल्मत में भी तनवीर-ए-हक़ीक़त देखना चाहे
वो मेरी तरह पिछली रात से बेदार हो जाए

ग़ुरूर-ए-हुस्न भी मेरे लिए जुज़्व-ए-अदा दाएरे
मिरा एहसास भी तेरे लिए पिंदार हो जाए

ग़म-ए-पिन्हाँ से दम घुटता है ऐ 'सीमाब' क्या कहिए
ख़ुदा ऐसा करे ये क़ाबिल-ए-इज़हार हो जाए