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जो हसीं हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल से गुज़र जाता है | शाही शायरी
jo hasin husn-e-taghaful se guzar jata hai

ग़ज़ल

जो हसीं हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल से गुज़र जाता है

जाफ़र अब्बास सफ़वी

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जो हसीं हुस्न-ए-तग़ाफ़ुल से गुज़र जाता है
चाहने वालों के वो दिल से उतर जाता है

जिस तरफ़ सेहन-ए-चमन से वो गुज़र जाता है
रंग फूलों का कहीं और निखर जाता है

आ भी जाओ कि दुआ माँग रहा हूँ कब से
बात रह जाती है और वक़्त गुज़र जाता है

उम्र-भर करवटें लेता है वो पैकान-ए-नज़र
आँख की राह से जो दिल में उतर जाता है

मेरे कहने से ज़रा ज़ुल्फ़ सँवारो तो सही
लोग कहते हैं मुक़द्दर भी सँवर जाता है

बहर-ए-ग़म में तेरी यादों का सहारा ले कर
ग़म का तूफ़ाँ भी मेरे सर से गुज़र जाता है

यक-ब-यक कैसे भुला दूँ उन्हें 'जाफ़र' दिल से
जाते जाते ही मोहब्बत का असर जाता है