जो भीगी रात तो आसेब के लश्कर निकल आए
किसी दीवार से आँखें किसी से सर निकल आए
छुटी जो धुँद तो कितने ही सूरत-गर निकल आए
कि मंज़र के पस-ए-मंज़र कई मंज़र निकल आए
सुलगती रेत फूलों की तरह बिस्तर निकल आए
बहुत मुमकिन है सहरा में भी कोई घर निकल आए
उगीं वीरानियाँ कमरे में छत में दर निकल आए
मिरी दीवानगी के फिर से बाल-ओ-पर निकल आए
ख़मोशी फैल कर जंगल हो और फिर शाख़-ए-सरगोशी
मिरी तन्हाइयों की झील के ऊपर निकल आए
खड़ी थीं दोनों जानिब नील में पानी की दीवारें
कि जो अहल-ए-असा थे बीच से हो कर निकल आए
जलन यादों की उस के तन-बदन में ऐसी रौशन हो
कि वो बारिश में कमरे से खुली छत पर निकल आए
कहीं रख़्ना ज़रूर अहबाब की साज़िश में था 'सैफ़ी'
कि हम फिर हल्क़ा-ए-गिर्दाब से बच कर निकल आए
ग़ज़ल
जो भीगी रात तो आसेब के लश्कर निकल आए
मुनीर सैफ़ी

