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जो भी कुछ ताक़-ए-ख़यालात पे रह जाते हैं | शाही शायरी
jo bhi kuchh taq-e-KHayalat pe rah jate hain

ग़ज़ल

जो भी कुछ ताक़-ए-ख़यालात पे रह जाते हैं

आमिर नज़र

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जो भी कुछ ताक़-ए-ख़यालात पे रह जाते हैं
ज़ीस्त के खे़मे उसी बात पे रह जाते हैं

शम-ए-साअ'त ने बहुत अक्स तराशा लेकिन
कुछ हयूले दर-ए-ज़ुल्मात पे रह जाते हैं

दिल ने तो लश्कर-ए-शादाब सँभाला है मगर
ख़ार-ओ-ख़स फिर भी मकानात पे रह जाते हैं

तिश्नगी ऐसी कि दरिया का लहू पी कर भी
सब्र के क़र्ज़ मुकाफ़ात पे रह जाते हैं

रक़्स-ए-नाहीद सर-ए-शाख़ तमाशा न हुआ
आईने होश के जब हाथ पे रह जाते हैं

कब तलक सीना-ए-सद-चाक का मातम होगा
सब रुके तेशा-ए-हालात पे रह जाते हैं

कैसे तारीख़ बने कोई हिकायत 'आमिर'
हाशिए आज भी सफ़्हात पे रह जाते हैं