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जो अना की सिफ़त है ज़ाती है | शाही शायरी
jo ana ki sifat hai zati hai

ग़ज़ल

जो अना की सिफ़त है ज़ाती है

डॉक्टर आज़म

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जो अना की सिफ़त है ज़ाती है
ये न आती है ये न जाती है

जब कोई फ़िक्र छटपटाती है
तब कहाँ नींद-वींद आती है

आज दानिस्ता बिंत-ए-हव्वा ख़ुद
इश्तिहारों के काम आती है

यूँ दबे पाँव आती तेरी याद
जिस तरह सुब्ह धूप आती है

मैं फ़िदाईन हो गया शायद
हर क़दम मेरा आत्म-घाती है

अब मोहब्बत है मस्लहत-आमेज़
अब कहाँ जू-ए-शीर लाती है

लोग अब फ़ैसला बताते हैं
और अदालत भी मान जाती है

ज़िंदगी की नुमूद भी 'आज़म'
सानिहाती है हादसाती है