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जिस को न दिल पे नाज़ हो नाज़ तिरे उठाए क्यूँ | शाही शायरी
jis ko na dil pe naz ho naz tere uThae kyun

ग़ज़ल

जिस को न दिल पे नाज़ हो नाज़ तिरे उठाए क्यूँ

मख़मूर जालंधरी

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जिस को न दिल पे नाज़ हो नाज़ तिरे उठाए क्यूँ
उठ न सके जो आस्ताँ ले के वो सर झुकाए क्यूँ

मैं जो तिरा हिजाब हूँ किस लिए बे-नक़ाब हूँ
पर्दा हो जिस का चाक चाक पर्दे में मुँह छुपाए क्यूँ

वो जो न दिल में भर सके नूर-ओ-ज़िया की बिजलियाँ
फूल में मुस्कुराए क्यूँ ज़र्रे में जगमगाए क्यूँ

हुस्न-ए-तबाह-कार है चाहे किसी भी शय में हो
हो न फ़रेब अगर हसीं कोई फ़रेब खाए क्यूँ

छाया हुआ है जब तमाम आलम-ए-काएनात पर
गोशा-ए-तंग-ओ-तार में दिल के वो फिर समाए क्यूँ

हश्र नए उठाए क्यूँ हुस्न को गर क़रार हो
हुस्न जो बे-सुकूँ न हो फ़ित्ने नए जगाए क्यूँ

अब तो अयाँ हुए बग़ैर जाने न पाओगे कभी
छुप के मिरी नज़र से तुम ख़ल्वत-ए-दिल में आए क्यूँ

शौक़ हो जिस का बे-कराँ दिल से भी हो जो बद-गुमाँ
अपनी निगाह को भी वो जल्वा तिरा दिखाए क्यूँ

पीर-ए-मुग़ाँ शजीअ हो ज़र्फ़ भी जब वसीअ' हो
बादा-कश-ए-निगाह-ए-मस्त नश्शे में लड़खड़ाए क्यूँ