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जीते-जी मेरे हर इक मुझ पे ही तन्क़ीद करे | शाही शायरी
jite-ji mere har ek mujh pe hi tanqid kare

ग़ज़ल

जीते-जी मेरे हर इक मुझ पे ही तन्क़ीद करे

मुर्तज़ा बिरलास

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जीते-जी मेरे हर इक मुझ पे ही तन्क़ीद करे
और मर जाऊँ तो दुनिया मिरी तक़लीद करे

मैं तो कहता हूँ कि तुम अब्र-ए-करम हो लेकिन
काश सहरा मिरे अल्फ़ाज़ की ताईद करे

जब हर इक बात निहाँ तिश्ना-ए-तकमील रहे
फिर करे कोई तो क्या जुरअत-ए-तम्हीद करे

पहले हर शख़्स गरेबान में अपने झाँके
फिर ब-सद-शौक़ किसी और पे तन्क़ीद करे

मैं समझता हूँ कि मुझ सा कोई मग़्मूम नहीं
हाल हर शख़्स का लेकिन मिरी तरदीद करे

मैं ही अब ज़हर पिए लेता हूँ सच की ख़ातिर
कोई तो सुन्नत-ए-सुक़रात की तज्दीद करे

वो मरी जुरअत-ए-पर्वाज़ को क्या समझेगा
जो फ़ज़ाओं को मुहीत-ए-मह-ओ-ख़ुर्शीद करे