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जीता रहूँ कि हिज्र में मर जाऊँ क्या करूँ | शाही शायरी
jita rahun ki hijr mein mar jaun kya karun

ग़ज़ल

जीता रहूँ कि हिज्र में मर जाऊँ क्या करूँ

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

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जीता रहूँ कि हिज्र में मर जाऊँ क्या करूँ
तू ही बता मुझे मैं किधर जाऊँ क्या करूँ

है इज़्तिराब-ए-दिल से निपट अर्सा मुझ पे तंग
आज उस तलक ब-दीदा-ए-तर जाऊँ क्या करूँ

हैरान हूँ कि क्यूँके ये क़िस्सा चुके मिरा
सर रख के तेग़ ही पे गुज़र जाऊँ क्या करूँ

बतला दे तू ही वा-शुद-ए-दिल का मुझे इलाज
गुलशन में ऐ नसीम-ए-सहर जाऊँ क्या करूँ

बैठा रहूँ कहाँ तलक उस दर पे 'मुसहफ़ी'
अब आई शाम होने को घर जाऊँ क्या करूँ