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जी रहे या न रहे हर क़दम-ए-यार न छोड़ | शाही शायरी
ji rahe ya na rahe har qadam-e-yar na chhoD

ग़ज़ल

जी रहे या न रहे हर क़दम-ए-यार न छोड़

क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी

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जी रहे या न रहे हर क़दम-ए-यार न छोड़
ऐ पतंगे तू कभी शम्अ' का अनवार न छोड़

शम्अ' तुझ को भी मुनासिब तू वहाँ तक जल जा
सर से ता पाए तिलक रिश्ता-ए-ज़ुन्नार न छोड़

लब-ए-शीरीं से अगर हो न तिरा लब शीरीं
कोहकन तू भी तो अब दामन-ए-कोहसार न छोड़

लीला हाथ आवे न आवे मिले जो नाक़ा-सवार
हाल-ए-ग़म से वो करे मनअ' पर इज़हार न छोड़

लफ़्ज़ तू ने जो कहे हैं वो ही हक़ ऐ मंसूर
कलिमतुल-हक़ को मगर ता-ब-दम-ए-दार न छोड़

ऐ ज़ुलेख़ा मह-ए-कनआँ' को ले दे माल मताअ'
पेश बाए' के कोई मुश्तरी ज़िन्हार न छोड़

इस नसीहत को मिरी मान ब-क़ौल 'अफ़रीदी'
जी रहे या न रहे पर क़दम-ए-यार न छोड़