जी लरज़ता है उमडती हुई तन्हाई से
अब निकालो मुझे उस रात की पहनाई से
आई यादों की हवा घुलने लगा कान में ज़हर
बुझ गई शाम भी बजती हुई शहनाई से
पूछता फिरता हूँ गलियों के उजड़ने का सबब
हर तरफ़ जम्अ' हैं क्या लोग तमाशाई से
सामने फैला हुआ दश्त का सन्नाटा है
अब कहाँ बच के चलें हम दिल-ए-सौदाई से
बन गया एक क़यामत दर-ए-दिल तक आना
और गुज़रना है अभी ध्यान की अँगनाई से
किस तरह अपना बनाएँ उसे हम ऐ 'जाफ़र'
बात आगे न बढ़ी जिस की शनासाई से
ग़ज़ल
जी लरज़ता है उमडती हुई तन्हाई से
जाफ़र शिराज़ी

