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जी लरज़ता है उमडती हुई तन्हाई से | शाही शायरी
ji larazta hai umaDti hui tanhai se

ग़ज़ल

जी लरज़ता है उमडती हुई तन्हाई से

जाफ़र शिराज़ी

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जी लरज़ता है उमडती हुई तन्हाई से
अब निकालो मुझे उस रात की पहनाई से

आई यादों की हवा घुलने लगा कान में ज़हर
बुझ गई शाम भी बजती हुई शहनाई से

पूछता फिरता हूँ गलियों के उजड़ने का सबब
हर तरफ़ जम्अ' हैं क्या लोग तमाशाई से

सामने फैला हुआ दश्त का सन्नाटा है
अब कहाँ बच के चलें हम दिल-ए-सौदाई से

बन गया एक क़यामत दर-ए-दिल तक आना
और गुज़रना है अभी ध्यान की अँगनाई से

किस तरह अपना बनाएँ उसे हम ऐ 'जाफ़र'
बात आगे न बढ़ी जिस की शनासाई से